देख लूं तो चलूं …..जिंदगी को जीता , सफ़र का एक खूबसूरत टुकडा
पेशे से चार्टर्ड अकाऊंटेंट और अप्रवासी भारतीय लेखक समीर लाल समीर जी हिंदी ब्लॉगिंग के बेहद लोकप्रिय ब्लॉगर होने के साथ ही शब्दों के एक कुशल चितेरे हैं । किसी भी बात को सहजता से अपनी एक विशिष्ट शैली में चुटीले शब्दों के सहारे वे एक ऐसा कथानक बुनते हैं कि पाठक उनके साथ साथ उनकी अंतिम पंक्ति तक बेरोकटोक और एक ही खटके में पहुंचना चाहता है । हाल ही में उनकी एक उपन्यासिका ” देख लूं तो चलूं ” शिवना प्रकाशन , सीहोर मध्यप्रदेश से प्रकाशित होकर आई है । विदेश में रहते हुए समीर लाल समीर जी ने एक सफ़र को इतने रोचक और दिलचस्प अंदाज़ में पेशे बयां किया है कि उसकी प्रस्तावना लिखते हुए , प्रसिद्ध शायर श्री पंकज सुबीर जी कहते हैं कि , “समीर जी की इस उपन्यासिका में अलग अलग रंग हैं । कहीं ये कल्पना से उपजी लगती है तो कहीं संस्मरणात्मक शैली में हैं तो कहीं डायरी लेखन की शैली में लिखी गई है । लेकिन समीर जी ने तीन शैलियों को कुशलता से साधा है । “
.
१०० रुपए मूल्य की और सत्तासी पन्नों की ये उपन्यासिका पेपर बैक संस्करण में आई है । कथानक की शुरूआत से लेकर उस सफ़र के टुकडे के अंतिम पडाव पर पहुंचने तक छोटे छोटे तेरह अध्यायों में बंट कर जीन के जाने कितने मोडों से गुजरती है । उपन्यासिका की शैली और स्वसंवाद का दिलचस्प अंदाज़ पाठकों को अंत तक बांधे रखता है , लेखक के कहने का अंदाज़ कुछ इस तरह का है मानो कि पाठक उनके साथ साथ कनाडा की उस सडक पर चलता चला जा रहा हो । लेखक न सिर्फ़ कनाडा की सडक , उसके किनारे चल रहे खूबसूरत दृश्यों , सहयात्रियों के मनोभावों को बखूबी उकेरते हैं बल्कि बचपन में गांव में बिताए पलों और भारतीय परिवेश के साथ उसका तालमेल बिठाते हुए , पाठक को एक ही सफ़र में , उस एक ही सडक पर न सिर्फ़ परदेस की रवायतों , उनके प्रचलित व्यवहार संस्कार से परिचित कराते चलते हैं बल्कि जबलपुर के पुराने दिनों से उसकी तुलना करते हुए ऐसी स्थितियों को ,ऐसे वाक्यों को पाठकों के सामने रख देते हैं वो खुद को भी उस सफ़र के साथ जुडा हुआ पाता है । बीच बीच में लेखक अपने भावों को पद्य के रूप में भी कहीं कहीं गुनगुनाते से चलते हैं मानो सफ़र में सुंदर संगीत सा पार्श्व में चल रहा हो ।.
चंद घंटों के एक सफ़र के टुकडे में पूरे जीवन को जीते हुए लेखक समीर लाल ने इस उपन्यासिका में अपनी विशिष्ट शैली से न सिर्फ़ व्यस्था , रुढियों , परंपराओं पर बहुत ही चुटीला प्रहार किया है बल्कि उन्होंने खुद पर भी अनेक उपहासी वाक्यों को बिंदास अंदाज़ में लिख डाला है । एक पाठक को इस उपन्यासिका में लेखक के साथ उस छोटे से सफ़र में प्रवासी पक्षियों से मुलाकात का , विदेश के एक लॉंग ड्राइव के मज़े का ,आनंद तो मिलता ही है साथ ही उस सफ़र के बीच बीच में जहां लेखक अकेला कार को ड्राईव करने के अतिरिक्त दिलो दिमाग को ड्राइव करते एक बहुत ही खूबसूरत नॉस्टेलजिक दुनिया में लेकर चला जाता है जहां से हटात लौटने का मन नहीं करता । सबसे ज्यादा आकर्षित करती हैं वे यादें जिन्हें लेखक ने उस समय याद किया है जब सफ़र में वे बाहर न झांक कर भीतर कहीं झांक रहे हैं । कभी अपने अनुभवों और कभी अपनी कल्पनाशीलता से परिस्थ्तियों को उपजाते हुए वे बहुत ही मनोरंजक क्षणों को उत्पन्न कर देते हैं । विशेषकर अनजाने में समलैंगिकों के परेड में शामिल होने का वाकया हो या किसी दूसरे सफ़र में मिली दो तरुणियों के हावभाव को भलीभांति ताडने की घटना । कुल मिला कर ये उपन्यासिका एक ही सिटिंग में पूरी पढ जाने जैसा आकर्षण बरकरार रख पाई है ।निश्चय ब्लॉगर समीर लाल समीर की ये उपन्यासिका प्रवासी लेखकों द्वारा लिखे जा रहे साहित्य को समृद्ध करने में एक सेतु का कार्य करती सी जान पडती है ।इस पुस्तक के कुछ अंश आपके लिए, छवि पर क्लिक करने से छवि अलग खिडकी में बडी होकर खुलेगी जिसे आप मजे से पढ सकते हैं
उपन्यासिका : देख लूं तो चलूं
लेखक: समीरलाल
लेखक संपर्क: smeerl.lal@gmail.com
प्रकाशक:शिवना प्रकाशन
पीसी लैब , सम्राट काम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैंड सीहोर -466 001
प्रकाशक संपर्क: shivna.prakashan@gmail.com
प्रकाशक फोन नं: +91- 9977855399, +91-7562-405545( नोट :- किसी भी पुस्तक को पढ के पहली बार इस तरह के समीक्षात्मक शब्दों को जोड तोड कर पोस्ट लिखने की कोशिश की गई है । कभी सोचा था कि” किताबों का कोना ” नाम से पुस्तक समीक्षा लिखने का प्रयास करूंगा । देखिए तो क्या इस कोशिश को बरकरार रखना चाहिए ? वैसे इस समीक्षा को तो प्रकाशनार्थ प्रेषित कर दिया गया है । प्रकाशन होने की स्थिति में आप तक सूचना अवश्य पहुंचाऊंगा )








बड़ी सुन्दर और सरल समीक्षा।
उत्तम समीक्षा….बहुत आभार इस स्नेह हेतु! बनाये रखिये.
अजय भाई, अच्छी समीक्षा की है….
बहुत सुन्दर समीक्षा की है …………सार्थक विश्लेषण ।
संतुलित शैली में सारगर्भित समीक्षा…
अच्छी और रोचक समीक्षा …
अच्छी समीक्षा। समीक्षक और लेखक को बधाई:)
सुन्दर समीक्षा ……..
प्रणाम.
बहुत उत्तम और संतुलित समीक्षा, शुभकामनाएं.
रामराम.
really agreed with what they were saying and thought I would share it with you all…
was surprised by this so thought I would share it with my readers…